गुल पनाग का हौसला बुलंद है

गुल बताती है कि वह काम के इंतजार में घर नहीं बैठ सकती कि उसके दरवाजे तक चलकर काम आयेगा। यह संभव है कि कोई निर्देशक उसे विशेष भूमिका के लायक नहीं समझे लेकिन इसके लिए आडिशन देकर उन्हें अपने पक्ष में तैयार कर सकती है।
इतना ही नहीं गुल पूरी तरह से निर्देशक के निर्देशन पर विश्वास करती है। वह नहीं सोचती कि उसे क्या भूमिका दी जा रही है क्योंकि एक निर्देशक को ही मालूम होता है कि किसे क्या भूमिका दी जानी चाहिए। गुल कहती है कि वह एक कलाकार है और कलाकार का काम है कि स्क्रिप्ट की मांग को पूरा करे।
गुल को इस बात का डर नहीं है कि उसके चरित्र को किस हद तक ले जाया जा सकता है। अब अगली बार गुल पनाग अंग प्रदर्शन कर अपनी मदमाती काया के दर्शन कराये तो इसमें चौंकने वाली कोई बात नहीं है।


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