ऋषि कपूर का 52 सालों का करियर: डेब्यू फिल्म मेरा नाम जोकर से रूलाया और आखिरी फिल्म शर्माजी नमकीन से हंसाया
ऋषि कपूर के करियर की आखिरी फिल्म शर्माजी नमकीन, अमेज़ॉन प्राईम पर रिलीज़ हो चुकी है और फैन्स ने फिल्म के रिलीज़ होते ही इसे देखा। हर कोई बस ऋषि कपूर को अपनी स्क्रीन पर आखिरी बार देखने का इंतज़ार कर रहा था। शर्माजी नमकीन देखकर हर किसी के चेहरे पर एक मुस्कान थी। इस फिल्म के साथ ऋषि कपूर के करियर के 52 साल पूरे हुए।
ऋषि कपूर ने अपना करियर एक युवा के तौर पर शुरू किया था अपने पिता राज कपूर की फिल्म मेरा नाम जोकर के साथ। इस फिल्म में ऋषि कपूर, अपने पिता के बचपन का किरदार निभाते दिखे थे।

दिलचस्प है कि जहां, अपनी डेब्यू फिल्म के साथ ऋषि कपूर रूला गए थे वहीं 52 सालों बाद, अपनी आखिरी फिल्म शर्माजी नमकीन के साथ वो हर किसी के चेहरे पर एक प्यारी सी मुस्कुराहट छोड़ गए।

मेरा नाम जोकर के साथ हुई थी शुरूआत
मेरा नाम जोकर के साथ ऋषि कपूर ने एक चाइल्ड एक्टर के तौर पर अपने करियर की शुरूआत की थी।एक जोकर बनकर सड़कों पर कारस्तानी दिखाते नन्हें ऋषि कपूर पर हर कोई फिदा हो गया था। वहीं एक छोटे से जोकर को यूं दुनिया को हंसाते देखकर लोगों की आंखें नम हो गई थीं। मेरा नाम जोकर, 18 दिसंबर 1970 को रिलीज़ हुई और बुरी तरह फ्लॉप हो गई।

फिर से हुआ डेब्यू
मेरा नाम जोकर के साथ राज कपूर को बहुत ज़्यादा नुकसान हुआ और वो कर्ज़ में डूब गए। इसके बाद उन्होंने अपनी ज़िंदगी का सबसे बड़ा रिस्क लिया। मेरा नाम जोकर के फ्लॉप होने के कुछ ही सालों बाद राज कपूर ने अपने बेटे ऋषि कपूर को लॉन्च करने की ठानी। और इस फिल्म के साथ बॉलीवुड को मिला उसका पहला चॉकलेटी हीरो।

रातों रात सुपरस्टार बन गए थे ऋषि कपूर
मेरा नाम जोकर से कर्ज़ में डूबे अपने पिता राज कपूर को ऋषि कपूर ने 1973 में बॉबी की रिलीज़ के साथ मुक्त किया। ऋषि कपूर के करियर के डेब्यू से जुड़ी कुछ और यादें उन्होंने खुद अपनी किताब में बताई थीं। ऋषि कपूर उस साल बॉबी से रातों रात सुपरस्टार बन गए। लेकिन उस साल उन्हें टक्कर देने के लिए एक और सुपरस्टार सामने आया - ज़ंजीर के साथ अमिताभ बच्चन।

आते ही होने लगी तुलना
ऋषि कपूर और अमिताभ बच्चन की सीधी तुलना होना शुरू हो गई। दोनों फिल्मों के बीच भी तुलना होना शुरू हो गई। बॉबी 5.6 करोड़ की कमाई कर ऑल टाईम ब्लॉकबस्टर तो बनी ही, साथ ही उस साल की सबसे ज़्यादा कमाने वाली फिल्म भी बनी। वहीं अमिताभ बच्चन की ज़ंजीर, 3 करोड़ के साथ उस साल की चौथी सबसे ज़्यादा कमाने वाली फिल्म बनी।

हुई अवार्ड की भारी जंग
ऋषि कपूर पर एक अलग ही तरह का प्रेशर था। वो बॉलीवुड के शोमैन राज कपूर के बेटे थे। और उन्हें खुद को साबित करना था। इसलिए ये बेहद ज़रूरी था कि उस साल का बेस्ट एक्टर अवार्ड वो ही जीतें। लेकिन उस साल हर जगह अमिताभ बच्चन का बोलबाला था। वहीं अपने प्रदर्शन को देखते हुए, ज़ंजीर के बॉक्स ऑफिस कलेक्शन को देखते हुए और फैन्स के रिएक्शन को देखते हुए अमिताभ बच्चन भी आश्वस्त थे कि ये अवार्ड उनके ही हाथ आएगा।

सालों बाद ऋषि कपूर ने माना - खरीदा था अवार्ड
तभी ऋषि कपूर को एक आदमी ने ऑफर दिया कि अगर वो 30 हज़ार रूपये देते हैं तो ये अवार्ड पक्का उनके ही नाम होगा। ये ऑफर ऋषि कपूर के लिए काफी लुभाने वाला था। और उन्होंने कुछ नहीं सोचा और सीधे अवार्ड खरीद लिया। सालों बाद अपनी किताब खुल्लम खुल्ला में ऋषि कपूर ने लिखा - कि मान लो मैंने अवार्ड खरीदा ही था क्योंकि एक आदमी ने मुझसे कहा था कि मुझे अवार्ड दिलवा देगा। बदले में तीस हज़ार लेगा। अब मैंने पैसे दे दिए और बाद में मुझे अवार्ड मिल गया तो मैं आज तक यही मानता हूं कि मैंने अवार्ड खरीदा था।

अमिताभ बच्चन Vs ऋषि कपूर
उस साल बेस्ट एक्टर के लिए पांच नॉमिनेशन थे - बॉबी के लिए ऋषि कपूर, ज़ंजीर के लिए अमिताभ बच्चन, यादों की बारात के लिए धर्मेंद्र, दाग के लिए राजेश खन्ना और कोशिश के लिए संजीव कुमार। ये साल अमिताभ बच्चन का breakthrough था। उन्होंने ज़ंजीर के साथ बॉलीवुड में अपना अलग रूतबा बनाया था। इस फिल्म के साथ वो बॉलीवुड के एंग्री यंग मैन बन चुके थे और सबको पूरी उम्मीद थी कि ये अवार्ड उनकी ही झोली में आकर गिरेगा।

पूरा किया था पिता का सपना
आखिरकार, मेरा नाम जोकर से हुए सारे नुकसान की भरपाई, ऋषि कपूर ने बॉबी के साथ कर दी थी। इसके बाद ऋषि कपूर आर के बैनर को आगे लेकर भी गए और बैनर के 50 साल पूरे होने पर उन्होंने आ अब लौट चलें का निर्माण भी किया था।


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