ना हीरो की तरह दिखते थे, ना विलेन; मनोज बाजपेयी; इसलिए हमेशा मिलते थे सपोर्टिंग रोल!

Manoj Bajpayee: मनोज बाजपेयी आज बॉलीवुड जगत में एक जाना माना नाम है। मनोज बाजपेयी की परफॉर्मेंस की हर कोई दाद देता है। हाल ही में ओटीटी प्लेटफॉर्म पर रिलीज हुई मनोज बाजपेयी की फिल्म 'सिर्फ एक बंदा काफी है', में उनका दमदार किरदार फिल्म को सफल बनाने में कामयाब हुआ।
नेशनल अवॉर्ड विनिंग एक्टर Manoj Bajpayee के पास बेशक आज काम की कमी नहीं है, लेकिन एक ऐसा भी समय था जब मनोज बाजपेयी को अपने करियर के शुरुआती दिनों में बहुत स्ट्रगल करना पड़ा।
लुक्स की वजह मिला रिजेक्शन
मनोज बाजपेयी ने हाल ही में अपने एक इंटरव्यू में बताया, करियर की शुरुआत में वे ना तो हीरो की तरह लगते थे, ना ही विलेन की तरह, इसलिए उन्हें हमेशा साइड रोल या सपोर्टिंग रोल के लिए चुना जाता था। अपने लुक्स की वजह से अवॉर्ड विनिंग एक्टर मनोज बाजपेयी को कई बार रिजेक्शन का चेहरा भी देखना पड़ा।
थिएटर का था अच्छा अनुभव
मनोज बाजपेयी को थिएटर में अभिनय करने का अच्छा खासा अनुभव था। वह बैंडिट क्वीन जैसी फिल्म भी कर चुके थे लेकिन फिर भी उन्हें किसी ने कभी गंभीरता से नहीं लिया।
खाने के लिए नहीं थे पैसे
मनोज बाजपेयी तीन दशकों से भी अधिक समय से बॉलीवुड में हैं। वह कई अहम फिल्में जैसे सत्या, गैंग्स ऑफ वासेपुर, पिंजर, अलीगढ़ और भोंसले में काम कर चुके हैं। लेकिन एक समय ऐसा भी था जब उनके पास खाने तक के लिए पैसे नहीं थे। हाल ही में मनोज बाजपेयी ने अपने मुंबई के शुरुआती दिनों के बारे में खुलकर बात की और उन्होंने याद किया कि कैसे उन्होंने उस समय भी 10 साल तक नाटक किए जब उनके हाथ में पैसा नहीं था।
कभी नहीं सोचा, बड़ा हीरो बनेंगे
मनोज बाजपेयी ने इंटरव्यू में बताया, ऑडिशन के दौरान उनके साथ बहुत अच्छा व्यवहार नहीं किया जाता था और कास्टिंग असिस्टेंट उनके चेहरे पर ही बोल दिया करते थे। हालांकि मनोज बाजपेयी ये भी कहते हैं कि अच्छा हुआ कि कास्टिंग असिस्टेंट मेरे मुंह पर बोल देते थे कि मैं ना हीरो लगता हूं ना विलेन। तो ऐसे में मैंने कभी ये सोचा ही नहीं कि मैं कभी बड़ा हीरो बनूंगा क्योंकि मुझे वह सोचने का मौका ही नहीं मिला।
इसलिए मनोज बाजपेयी को हमेशा विलेन के सहयोगी के रूप में दिखाया जाता था। यहां तक कि उन्हें नायक के दोस्त के रूप में भी भूमिकाएं मिलना मुश्किल होता था।
अपनी फिल्मों की खुद करते थे मार्केटिंग
मनोज बाजपेयी ने यह भी बताया कि बताया, मेरे पास लंबे समय तक कोई प्रचारक नहीं था। मैं अपनी फिल्मों की मार्केटिंग खुद ही करता था। कई सालों तक उन्होंने ऐसा ही किया। चाहे उनकी फिल्म भोंसले हो, गली गुलियां हो या अलीगढ़ हो। सबका पीआर मनोज बाजपेयी ने खुद ही किया। वे जानते हैं कि मार्केट में उन्हें क्या करना है कैसे करना है। कई सालों तक मनोज बाजपेयी के पास कोई टीम या कोई असिस्टेंट भी नहीं था जो कि उनकी फिल्मों को प्रमोट कर सकें। उनका मानना है कि इंडिपेंडेंट फिल्मों का बजट बहुत ज्यादा नहीं होता। इसलिए बड़ी टीम हायर करना मुश्किल है।
मनोज बाजपेयी का वर्क फ्रंट
आपको बता दें, 23 मई को हाल ही में रिलीज हुई 'सिर्फ एक बंदा काफी है' फिल्म में मनोज वाजपेई को आखिरी बार देखा गया। इससे पहले वे गुलमोहर में वेटरन एक्ट्रेस शर्मिला टैगोर के साथ दिखे। ये फिल्म डिज्नी हॉटस्टार पर मार्च में रिलीज हुई थी। इसके अलावा मनोज बाजपेयी की फैमिली मैन सीजन 3 रिलीज होने वाला है।


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