आखिर कौन थी वो महारानी जिसने पति से तलाक लेने के लिए अपनाया मुस्लिम धर्म? जानें पूरी लवस्टोरी

बड़ौदा की एक ऐसी महारानी हुआ करती थी जिसकी अजब प्रेम कहानी सुर्खियों में रही. दरअसल हम बात कर रहे हैं सीता देवी की. उनका स्वभाव का की चंचल हुआ करता था और रेस कोर्स के दौरान उनकी नजर बड़ौदा के महाराजा पर पड़ी. दोनों को एक दूसरे से बेइंतहा प्यार हो गया और शादी करने के लिए दोनों बेकरार हो गए. लेकिन सीतादेवी पहले से ही शादीशुदा थी और तलाक लेने के लिए उनके पति ने साफ मना कर दिया था. इसीलिए उन्होंने धर्म परिवर्तन कर और मुस्लिम बन महाराजा से शादी रचाई. तो चलिए जानते हैं क्या है इनकी प्रेम कहानी.
दोनों की पहले से हो रखी थी शादी
दरअसल आपको बता दें कि 1943 में मद्रास हॉर्स रेस कोर्स में बड़ौदा के राजा प्रताप सिंह गायकवाड शामिल हुए थे जहां पर उनकी मुलाकात सीतादेवी से हुई. प्रताप देखते ही सीतादेवी पर फिदा हो गए. दोनों की ही पहले से शादी हो चुकी थी और दोनों के बच्चे भी थे. लेकिन इसके बावजूद भी दोनों एक दूसरे से शादी करने के लिए उतावले हुए जा रहे थे और शादी करने का फैसला भी ले लिया. लेकिन इस प्रेम कहानी में कई मुश्किलें आई.
सीता के पति ने तलाक देने से किया इनकार
जानकारी के लिए आपको बता दें कि सीता के पति अप्पा राव तलाक देने के लिए राजी नहीं हो रहे थे और उन्होंने साफ मना कर दिया था. यहां तक कि अप्पा राव ने महाराज प्रताप को भी बीवी से दूर रहने की वार्निंग दे दी थी. लेकिन खुद होना तो सीतादेवी नहीं और ना प्रताप ने अपने पैरों को पीछे किया. जिसके बाद में महाराजा प्रताप की कानूनी टीम ने इसका हल निकाला और सीता देवी से मुस्लिम धर्म अपनाने को कहा. सीता देवी ने ऐसा ही किया और इसके बावजूद भी उनके पति अप्पा राव ने तलाक देने से इनकार कर दिया.
धर्म परिवर्तन कर सीता ने पति से लिया तलाक
लेकिन आपको बता दें कि सीतादेवी ने एक तलाकनामा तैयार करवाया और वह मुस्लिम है इसलिए हाथ से वह गैर मुस्लिम पति के साथ में नहीं रहेंगी. जिसके बाद में इस्लाम के अनुसार उन्हें तलाक की मंजूरी मिल गई. लेकिन फिर से कई सारी और दिक्कत है उनकी प्रेम कहानी में सामने आई. दरअसल अंग्रेज सरकार ने कानूनी पेच फंसा दिया और कहा कि बड़ौदा में ऐसा कानून है की पहली पत्नी के जिंदा होते या फिर बगैर तलाक लिए दूसरी शादी नहीं की जा सकती. लेकिन काफी मशक्कत के बाद में अंग्रेज सरकार मान गई और इस बात की शर्त रखी कि बड़ौदा राजघराने का उत्तराधिकारी उनकी पहली पत्नी का बेटा ही होगा.
सीता और बड़ौदा के महाराज की हुई शादी
जिसके बाद में सीता देवी ने आर्य समाज तरीके से मुस्लिम से हिंदू धर्म अपनाया. अपने तीनों बच्चों को उन्होंने पहले पति के पास छोड़ दिया और महाराजा के साथ में बड़ौदा आकर शादी रचाई उस वक्त पूरी दुनिया दूसरे विश्व युद्ध में उलझी हुई थी और 1946 में वर्ल्ड वॉर खत्म होते ही महाराजा बड़ौदा दूसरी पत्नी को लेकर यूरोप पर निकल पड़े. सीतादेवी भारत में रहने में इच्छुक नहीं थी और इसी वजह से महाराजा ने यूरोप में उनको एक बेहतरीन और शानदार घर खरीद कर दे दिया.
शादी के 13 साल बाद ही हुआ डिवोर्स
बाद में महाराजा प्रताप को महारानी सीता देवी से एक बेटा प्राप्त हुआ. धीरे-धीरे सीता देवी ने यूरोप में अपनी एक खास पहचान बनाई और हाई सोसाइटी में उठने बैठने लगी . उनकी संपत्ति तकरीबन 300 मिलियन डॉलर यानी कि 2200 करोड रुपए हो गई थी. लेकिन आपको बता दें कि महारानी के पास में पैसा कमाने लगा और महाराजा प्रताप का खजाना भी खत्म होने लग गया था. जिस वजह से दोनों में मतभेद होने लगे. इसका नतीजा निकला कि 1956 यानी की शादी के 13 साल बाद में दोनों का तलाक हो गया. उनको थोड़े बहुत पैसे मिले लेकिन वह भी उन्होंने अपनी शाही रुतबे में खत्म कर दिए. बाद में महारानी के इकलौते बेटे कि 1985 में ड्रग और ज्यादा शराब पीने से मौत हुई. रानी भी इस गम को झेलना पाई और 1 साल के बाद में ही पेरिस में 69 साल की उम्र में ही मौत हो गई.


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