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    Release Rewind: वीर - ज़ारा, सरहद और उम्र लांघता प्यार

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    यश चोपड़ा रोमांस की बात करें और वीर ज़ारा को भूल गए तो फिर बॉलीवुड के प्यार की गहराई में आपने गोते नहीं लगाए जनाब। इस फिल्म में सबकुछ था....संजीदगी, रूहानियत और मोहब्बत। इसके अलावा फिल्म में ऐसी छोटी छोटी बहुत सी बातें थीं जिन्होंने वीर और ज़ारा को समय और वक्त से अलग एक प्रेम कहानी बना दिया। ऐसी प्रेम कहानी जो वीर की हिम्मत के बिना अधूरी, ऐसी प्रेम कहानी जो ज़ारा की खुशबू के बिना अधूरी है, ऐसी प्रेम कहानी जो सामिया की ज़िद के बिना अधूरी, ऐसी प्रेम कहानी जो यश चोपड़ा की मोहब्बत के बिना अधूरी है। देखिए वीर ज़ारा से जुड़े कुछ पहलू जो दर्शकों को छू गए -

     वीर की हिम्मत

    वीर की हिम्मत

    शाहरूख के किरदार को जिस तरह पिरोया गया वो बिल्कुल अल्हदा था। उसमें ठहराव था और समझ थी। इसके अलावा उसमें सही गलत में अंतर करने की संजीदगी भी थी। ज़ारा के लिए वीर का ज़िंदगी भर चुप रहना एक ऐसी मोहब्बत जो अब बॉलीवुड में कम ही देखने को मिलती है। शाहरूख ने अपने रोल में अपनी रोमांटिक इमेज से इतर एक सीरियस इमेज बनाई जो फिल्म के लिए बेस्ट मैच थी।

    ज़ारा की खुश्बू

    ज़ारा की खुश्बू

    फिल्म को प्रीती ज़िंटा के किरदार ने अपनी खुश्बू से महकाए रखा। एक दूसरे मुल्क की झलक कोई इंसान अपने वजूद से दे, ऐसा भी बमुश्किल ही होता है। ज़ारा के किरदार ने एक आम लड़की की पूरी ज़िंदगी को समेट लिया था...हम तो भई जैसे हैं कि चुलबुली ज़ारा से लेकर, स्कूल में बच्चों की ज़िम्मेदारी उठाती ज़ारा।

     सामिया का जुनून

    सामिया का जुनून

    वो ज़िद्दी थी, जुनूनी थी लेकिन केवल अपने काम को सच्चाई से करने के लिए। रानी के किरदार में वो हर मुश्किल थी जो शायद लड़कियां आदमियों की दुनिया में झेलती है। फिर चाहे वो किसी का देश हो या किसी का वतन, मुश्किलें हर जगह है और उसका हल एक ही है - ज़िद और जुनून।

     देश और मुल्क में कोई अंतर नहीं

    देश और मुल्क में कोई अंतर नहीं

    एक गाने से यश चोपड़ा ने दो देशों को बड़ी आसानी से जोड़ दिया। ऐसा देस है मेरा एक खूबसूरत सोच थी, जहां दो ज़मीन के टुकड़ों की बात नहीं होती बल्कि उन टुकड़ों पर सांसे लेती, रोज़ बदलती ज़िंदगी की बात होती है जो गुलज़ार भी है और सुंदर भी।

    मां - बाप किसी के भी हों, एक जैसे ही होते हैं

    मां - बाप किसी के भी हों, एक जैसे ही होते हैं

    जहां हेमा मालिनी और अमिताभ बच्चन के किरदार ज़ारा को एक दिन में भरपूर प्यार और अपनापन देते हैं वहीं किरण खेर का किरदार शाहूरूख को आशीर्वाद देता है कि हर मां को उसके जैसा बेटा मिले। जी हां ऐसा होता है, मां बाप किसी के भी हों, हर औलाद के लिए अपनापन उनका काम ही है। आजकल की फिल्मों में मां बाप खो गए हैं कहीं ज़रा।

    कुछ रिश्तों का नाम नहीं होता

    कुछ रिश्तों का नाम नहीं होता

    ज़िंदगी में कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं जिन्हें आप कोई नाम नहीं देना चाहते क्योंकि वो बहुत खास होते हैं। ये खास रिश्ते ही थे जो ज़ारा को बेबे (ज़ोहरा सेहगल) की अस्तियां बहाने दूसरे मुल्क जाने की हिम्मत देते हैं। ये रिश्ते ही हैं जो सामिया और वीर के बीच सारी बातें बताने की हौसला पैदा करती है, ये रिश्ते ही थे जो दिव्या दत्ता को एक अजनबी को भी पनाह देने की ज़रूरत बनाती हैं।

    बीते दौर की धुनें

    बीते दौर की धुनें

    वीर - ज़ारा के गाने बेहतरीन हैं। एक एक लफ्ज़ तराशा हुआ और एक एक सुर प्यार से छेड़ा हुआ। इन गीतों में मदन मोहन की पुरानी धुनों को इस्तेमाल करना आपको यश चोपड़ा का मुरीद बना देती है। सोनू निगम की आवाज़ में क्यूं हवा आज यूं गा रही है और दूर से आती लता जी की आवाज़। यश चोपड़ा की आवाज़ में एक संवाद - आज सवेरे सवेरे सुरमई से अंधेर की चादर हटाके पर्वत के तकिये ने सर जो उठाया तो देखा दिल की वादियों में चाहत का मौसम है।

    प्यार की न सरहद, न उम्र

    प्यार की न सरहद, न उम्र

    लो आ गई लोहड़ी वे पर थिरकते वीर ज़ारा, तेरे लिए हम हैं जिये गाते भी अजीब नहीं लगते। न वीर की झुर्रियां उसके प्यार का जुनून कम करती हैं न ज़ारा के सफेद बाल उसके चेहरे की लाली कम करते हैं। मोहब्बत इस उम्र में भी उतनी ही मासूम लगती हैं।

    English summary
    Celebrating 10 years of Veer Zaara, an amazing romance from Yash Chopra with Shahrukh Khan and Preity Zinta.
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