55 साल के बॉलीवुड के नामी डायरेक्टर ने 18 साल की इस एक्ट्रेस से रचा ली शादी, अपने ही घर में लाकर...
V. Shantaram Marriages: जब भारतीय सिनेमा की शुरुआत हुई, तब ज़्यादातर फिल्में प्यार और गानों पर आधारित होती थीं। लेकिन उसी दौर में एक ऐसे फिल्मकार भी थे, जिन्होंने फिल्मों को समाज की सच्चाई दिखाने का ज़रिया बनाया। इस महान निर्देशक का नाम था वी. शांताराम। लोग उन्हें प्यार से शांताराम बापू कहते थे। उनका जीवन खुद एक फिल्म की तरह था, जो संघर्ष और मेहनत से भरा हुआ था।

वी. शांताराम का बचपन
वी. शांताराम का जन्म 18 नवंबर 1901 को महाराष्ट्र के कोल्हापुर में हुआ था। उनका परिवार साधारण था और बचपन में उन्हें कई परेशानियों का सामना करना पड़ा। पढ़ाई ज्यादा नहीं हो पाई और घर की हालत भी ठीक नहीं थी। काम की तलाश में उन्होंने रेलवे में दिहाड़ी मजदूर के रूप में काम किया, लेकिन उनके सपने बहुत बड़े थे।
ऐसे शुरू हुआ फिल्मों का सफर
साल 1920 में उन्होंने फिल्मों में एक्टर के तौर पर काम शुरू किया। कुछ समय बाद उन्हें समझ आ गया कि उनका असली हुनर अभिनय से ज्यादा फिल्म बनाने में है। इसके बाद उन्होंने निर्देशन की राह पकड़ी और कई शानदार फिल्में बनाईं। उन्होंने राजकमल कलामंदिर नाम का फिल्म स्टूडियो भी शुरू किया, जिसने भारतीय सिनेमा को नई पहचान दी।
वी. शांताराम की शादियां
वी. शांताराम का निजी जीवन भी हमेशा चर्चा में रहा। उनकी पहली शादी कम उम्र में विमलाबाई से हुई थी, जिनसे उन्हें चार बच्चे हुए। बाद में उनकी जिंदगी में मशहूर अभिनेत्री जयश्री आईं और 1941 में उन्होंने उनसे दूसरी शादी की। इस शादी से उनके तीन बच्चे हुए। उनकी बेटी राजश्री आगे चलकर बड़ी अभिनेत्री बनीं।
18 साल की एक्ट्रेस से तीसरी शादी
1956 में उनकी जिंदगी में सबसे ज्यादा चर्चा वाला मोड़ आया। तब उनकी उम्र 55 साल थी और उन्होंने 18 साल की अभिनेत्री संध्या से शादी कर ली। उम्र का बड़ा फर्क होने के कारण यह शादी लोगों के बीच खूब चर्चा में रही। उस समय कानून इसकी इजाजत देता था, इसलिए शांताराम ने अपने परिवार की जिम्मेदारियां निभाईं।
पहली पत्नी के साथ रहती थी तीसरी पत्नी
एक खास बात यह थी कि उनकी पहली पत्नी विमलाबाई और तीसरी पत्नी संध्या एक ही घर में शांति से रहती थीं। उस समय ऐसा होना बहुत ही अलग और हैरानी वाली बात मानी जाती थी।
वी. शांताराम को उनकी शादियों से ज्यादा उनकी शानदार फिल्मों के लिए याद किया जाता है। उन्होंने 'डॉ. कोटनिस की अमर कहानी', 'दो आंखें बारह हाथ' और 'नवरंग' जैसी यादगार फिल्में बनाईं। उनकी फिल्मों में समाज की बुराइयों और इंसानियत की बातें दिखाई जाती थीं। 'दो आंखें बारह हाथ' में उन्होंने जेल और कैदियों के सुधार की कहानी दिखाई, जो आज भी बहुत सराही जाती है।
साल 1990 में वी. शांताराम का निधन हो गया, लेकिन उनके द्वारा बनाई गई फिल्में और उनकी सोच आज भी लोगों को प्रेरणा देती हैं। वे सच में भारतीय सिनेमा के सबसे महान फिल्मकारों में से एक थे।


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