बॉलीवुड का ऐसा एक्टर जिसकी मौत के बाद रिलीज हुई थी 10 फिल्में, शादी ना करने की थी खास वजह

Sanjeev Kumar

फिल्म 'शोले' में ठाकुर का किरदार हो या फिल्म 'सीता और गीता' में हेमा मालिनी का रोमांटिक बॉयफ्रेंड...या फिर फिल्म 'पति पत्नी और वो' का मजेदार पति, संजीव कुमार हर किरदार में खुद को ढाल लेने की कला में माहिर थे। काफी कम उम्र में ही उन्होंने दुनिया को अलविदा कह दिया था। लेकिन अपनी कलाकारी और एक्टिंग की बदौलत उन्होंने फिल्म इंडस्ट्री में अपना एक अलग मुकाम हासिल किया था। महज 47 साल की उम्र में दिल का दौरा पड़ने से संजीव कुमार की मौत हो गयी थी। अपने करियर में उन्होंने कई सुपरहिट फिल्में दी थी। क्या आपको पता है, संजीव कुमार ने कभी शादी क्यों नहीं की? दरअसल, संजीव कुमार को लंबे समय से दिल की बीमारी थी और यहीं वजह है कि उन्होंने कभी शादी ना करने का फैसला लिया था। संजीव कुमार की जब मौत हुई तब वह कई फिल्मों में काम भी कर रहे थे।

मौत के बाद रिलीज हुई फिल्में :

संजीव कुमार दिल के मरीज जरूर थे लेकिन उनकी मौत इतनी अकस्मात हो जाएगी, इसका किसी को अंदाजा नहीं था। संजीव कुमार की जब मौत हुई, उस समय वह कई फिल्मों में काम कर रहे थे, जिनको अधुरा छोड़कर ही उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कह दिया। जिन फिल्मों की शूटिंग अधुरी रह गयी थी, उन फिल्मों की कहानियों में थोड़ा बहुत फेरबदल कर उन्हें अलग-अलग समय रिलीज किया गया। इस तरह से उनकी मौत के बाद करीब 10 ऐसी फिल्में रिलीज हुई। साल 1993 में उनकी अंतिम फिल्म 'प्रोफेसर की पड़ोसन' प्रदर्शित हुई। इसके अलावा 'कातिल' (1986), 'हाथों की लकीरें' (1986), 'बात बन जाए' (1986), 'कांच की दीवार' (1986), 'लव एंड गॉड' (1986), 'राही' (1986), 'दो वक्त की रोटी' (1988), 'नामुमकिन' (1988), 'ऊंच नीच बीच '(1989) फिल्में उनकी मौत के बाद रिलीज हुई थी।

एक फिल्म में निभाए थे 9 किरदार :

आज के समय में कोई एक्टर किसी फिल्म में दोहरा तो किसी फिल्म में 3 किरदार निभाता है। लेकिन संजीव कुमार ऐसे एक्टर थे जिन्होंने एक फिल्म में एक या 2 नहीं बल्कि 9 किरदार निभाए थे। उन्होंने फिल्म 'नया दिन नयी रात' में यह कारनामा किया था। संजीव कुमार ऐसे एक्टर थे जो हीरो, साइड रोल से लेकर नेगेटिव किरदारों में भी अपने दर्शकों का दिल जीत लेते थे। इस फिल्म में उन्हें लुले, लंगड़े, जवान, वृद्ध, डाकू, बीमार, कोढ़ी, हिजड़ा और प्रोफेसर का किरदार निभाया था जो जीवन के नवरस का प्रतीक है।

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