बदलापुर देख याद आए रफी साहब- जला दो इसे, फूंक डालो ये दुनिया..
1957 फिल्म प्यासा, मोहम्मद रफी की आवाज में गाया गया गाना..
ये महलों ये तख्तों ये ताजों की दुनिया,
ये इंसानों के दुश्मन समाजों की दुनिया
ये दौलत के भूखे रवाजों की दुनिया,
ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है,
ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है।
सालों बाद 2015 में रिलीज हुई बदलापुर, रघु (वरुण धवन) की परिस्थिति उसके दिमाग में चल रही हलचल को इन्हीं पक्तियों द्वारा व्यक्त किया जा सकता है। रघु जिससे उसकी पत्नी, उसका बेटा छीन लिया गया और अकेला छोड़ दिया गया इस समाज का सामना करने के लिए। उसके लिए अपनी पत्नी और बेटे के हत्यारे को मारने के अलावा जीने का और कोई मकसद नहीं रह जाता।
फिल्म के पहले दृष्य से लेकर अंतिम दृष्य तक रघु के बदले की कहानी चलती है। लायक जो कि फिल्म का हीरो है उसने गलत किया लेकिन फिर भी दर्शकों के लिए वो अंत में हीरो और रघु जो हीरो है वो अंत में विलेन बनके रह जाता है। क्योंकि रघु हीरो होकर भी सबकुछ निगेटिव ही करता है वहीं लायक (नवाजुद्दीन सिद्दिकी) विलेन होकर भी अंत में एक पॉजिटिव काम करके रघु की जिंदगी बचाकर हीरो बन जाता है।
फिल्म का अंत होता है और जब रघु अकेला खड़ा होता है, झिमली (हुमा कुरैशी) उसके पास आती है और उसे कहती है कि लायक ने तुम्हे दूसरा मौका दिया है किसी को दूसरा मौका नहीं मिलता उस वक्त रघु की परिस्थिति को कुछ इस तरह पेश किया जा सकता है-
जला दो इसे फूंक डालो ये दुनिया,
मेरे सामने से हटा लो ये दुनिया,
तुम्हारी है तुम ही संभालो ये दुनिया,
ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है..
हालांकि ये कहना गलत ना होगा कि निर्देशक श्रीराम ने बदलापुर के एक बेहद ही गंभीर और मुद्दे पर आधारित रखा है। लेकिन बस इतनी कमी रह गयी कि उनकी फिल्म के अंत में हीरो को विलने और विलेन को हीरो बना दिया गया। दर्शकों को पहले सीन से अंतिम सीन तक मुस्कुराने के मौके सिर्फ नवाजुद्दीन ने दिये क्योंकि वो ही इसके लायक थे। अंत भी दुख भरा रहा। तो जरा रिव्यू पढ़ते हुए मुस्कुराना तो बनता है।


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