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65 साल और बन गईं 8 फिल्में, इस Khan की मिली ब्लॉकबस्टर, फिर भी Fail

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आज देश में हर तरफ सिर्फ किसानों का मुद्दा नजर आ रहा है। टीवी चैनलों से लेकर सोशल मीडिया तक किसानों का सैलाब दिखाई दे रहा है। हजारों की संख्या में किसान अपनी मांगो को लेकर नंगे पांव मुंबई पहुंचे हैं। राजनीतिक दल तो किसानों से जुड़ा मुद्दा जब-कब उठते ही रहते हैं लेकिन शायद पहली बार इतनी बड़ी संख्या में किसान खुद अपने हक की बात करने पहुंचे हैं। जहां हर जगह सिर्फ किसान ही किसान दिखाई दे रहे हैं वहीं आज हम भी किसानों की बात करते हैं।

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बॉलीवुड में भी फिल्मों के जरिए कई बार किसानों के लिए आवाज उठाई गई है। ये फिल्में कमर्शियल सिनेमा से काफी ऊपर हैं। किसानों की दशा तो देशभर जानता है और उनकी ये हालत आज से नहीं है बल्कि दशकों से चली आ रही है। ऐसे में कई दशकों से बॉलीवुड भी अलग-अलग फिल्मों के जरिए उनकी बात कहने की कोशिश करता नजर आया है। किसानों से जुड़ी पहली फिल्म 65 साल पहले यानी 1953 में आई थी, तब से अब तक इस मुद्दे पर की फिल्में बन चुकी हैं।

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मदर इंडिया से लेकर कड़वी हवा तक देश के अन्नदाता की हालत नहीं बदली। आज हम आपको बता रहे हैं बॉलीवुड की उन फिल्मों के बारे में जो किसानों पर आधारित थीं और इन फिल्मों के जरिए अलग-अलग तरीकों से किसानों की आवाज उठाने की कोशिश की जाती रही-

 दो बीघा जमीन

दो बीघा जमीन

1953 में आई ये फिल्म भारतीय किसानों की दशा को सही तरीके से उकेरती है। इस फिल्म में किसानों के लिए मां समान मानी जाने वाली जमीन उनसे छीन ली जाती है, इसके बाद कर्ज में धंसता किसान और नेवलों की तरह उन्हें निगलते साहूकारों की कहानी दिखाई गई है।

मदर इंडिया

मदर इंडिया

1957 में आई इस फिल्म में गरीबी और भुखमरी से जूझती एक महिला किसान की कहानी दिखाई गई है। इस फिल्म को 1957 में तीसरी सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म के लिए राष्ट्रिय फिल्म पुरूस्कार से नवाजा गया था।

लगान

लगान

2001 में आई आमिर खान की ये फिल्म आजादी से पहले किसानों से लगान वसूली के नाम पर उनके खून चूसने की दशा को दिखती है। आमिर की ये फिल्म ऑस्कर के लिए भेजी गई थी।

पीपली लाइव

पीपली लाइव

2010 में आमिर खान के प्रोडक्शन की एक और फिल्म आई जिसमें गरीबी से जूझते किसानों पर देश की मीडिया की फूहड कवरेज पर व्यंयग किया गया था। ये फिल्म भी आमिर खान की बेहतरीन फिल्म रही।

उपकार

उपकार

1967 में मनोज कुमार की फिल्म उपकार में भी किसानों की दशा दिखाई गई। फिल्म में किसान मां अपने दोनों बच्चों को पढ़ाने का सपना पूरा नहीं कर पाती है तो एक को पढ़ाई के लिए सहर भेज देती दूसरा बेटा किसान बनता है तो गरीबी में दर-दर की ठोंकरें खाता है। सीधा-सादा किसान किस तरह पढ़े-लिखे लोगों से धोखा खाता है इस फिल्म में बखूबी दिखाया गया है।

मंथन

मंथन

1976 में आई फिल्म मंथन में भारत में सफेद आंदोलन के दौरान की हालत दर्शाई गई है। इस फिल्म में दिखाया गया है कि किस तरह एक-एक करके 500,000 किसान 2-2 रुपए जमा करते हैं और इस आंदोलन को क्रांति बनाते हैं। इस फिल्म 1977 में बेस्ट फिल्म का नेशनल अवार्ड मिला था।

कडवी हवा

कडवी हवा

आज के भारत की इस बदलती आबोहवा की असली मार तो किसानों पर पड़ती है। बारिश- बाढ़ और सूखे से जूझते एक किसान परिवार की ये दर्द भरी कहानी आपको अंदर तक हिला कर रख देगी।

किसान

किसान

2009 में आई इस फिल्म में किसानों की आत्महत्या के भयंकर सच को उकेरा गया था। फिल्म में अरबाज खान और सोहेल खान मुख्य भूमिका में थे।

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    English summary
    news channels and social media is flooded with news of farmers march to mumbai today. thousand of these farmers came to Mumbai for their rights. farmers in india is the most suffering class and time to time bollywood had shown their plight with films based on Indian farmers.

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