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Film Review: साला खड़ूस, फिल्म के हीरो हैं माधवन और विलेन शाहरूख खान!

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2.5/5

[फिल्म समीक्षा] एयरलिफ्ट के बाद बॉलीवुड बहुत ही अच्छे मूड में चल रहा है और फैन्स को साला खड़ूस से काफी उम्मीदें हैं। फिल्म दर्शकों की हर कसौटी पर खरी भी उतरती अगर शाहरूख खान नहीं होते।

साला खड़ूस के विलेन हैं शिमित अमीन क्योंकि उनकी चक दे इंडिया इतनी बुरी तरह सबके दिमाग पर छपी है कि उस तरह की कोई भी फिल्म अटेंप्ट करना ही सुसाइड से कम नहीं है। इसलिए कोशिश के लिए डायरेक्टर सुधा कोंगारा प्रसाद को शाबाशी देनी चाहिए।


लेकिन साला खड़ूस एक कमज़ोर फिल्म है जिसे बहुत ही उम्दा तरीके से ए आर माधवन बचाने की कोशिश करते हैं। फिल्म एक स्पोर्ट्स ड्रामा है और हर कदम पर थोड़ी थोड़ी देर में आपको चक दे इंडिया की याद दिलाती है।


क्योंकि ट्रीटमेंट से लेकर कहानी तक में फिल्म काफी हद तक वहीं हैं। लेकिन इस बार ड्रामा और बॉलीवुड के थोड़े मसाले भी हैं। लेकिन इनमें से कुछ भी फिल्म को बांधने भर के लिए काफी नहीं है।


पढ़िए फिल्म की पूरी समीक्षा -

कहानी

कहानी

फिल्म की कहानी है आदि तोमर (आर माधवन) की जो एक बॉक्सर है। उसे गोल्ड मेडल चाहिए लेकिन स्पोर्ट्स और पॉलिटिक्स के चलते नहीं मिलता। फिर वो ढूंढता है एक स्टूडेंट जो उसके सपने को पूरा कर सके और वह स्टूडेंट है चेन्नई की मधि (रीतिका सिंह)।


ट्विस्ट

ट्विस्ट

फिल्म के पास अपने छोटे छोटे मूमेंट्स हैं लेकिन फिल्म में कोई ट्विस्ट नहीं है। इकलौता ट्विस्ट है हिसार के अड़ियल और गुस्सैल आदि का हिसार से ट्रांस्फर होकर चेन्नई जाना जिसके बाद फिल्म का मुख्य प्लॉट शुरू होता है।


अभिनय

अभिनय

एक लचीली सी कहानी को अगर कोई बांध कर पौने दो घंटे रखता है तो वो आर माधवन हैं। उनसे स्टार्स को सीखना चाहिए कि आपको बॉलीवुड का बादशाह नहीं अभिनय का शहंशाह होना चाहिए। वहीं बॉक्सर रीतिका सिंह भी डेब्यू के हिसाब से अच्छा काम करती दिखी हैं।


निर्देशन

निर्देशन

फिल्म की सबसे बड़ी कमी है सुधा कोंगारा का डायरेक्शन। उन्होंने फिल्म को डेवलप होने की कोई गुंजाईश ही नहीं दी है। ऐसा लगता है कि उन्होंने एक कहानी को कागज़ पर लिखा और बस उसे पढ़ दिया।


तकनीकी पक्ष

तकनीकी पक्ष

फिल्म की कहानी में कुछ नया नहीं। बॉक्सर रीतिका सिंह की बदौलत सारे फाइटिंग सीन अच्छे हैं और क्लाईमैक्स पर आपको तालियां बजाने पर मजबूर करेगा लेकिन फिर भी फिल्म कमज़ोर है।


संगीत

संगीत

फिल्म का म्यूज़िक बेजोड़ है। पांच गानों के एल्बम ने फिल्म को बांधा है और कोई भी गाना कहीं भी अतिरिक्त नहीं लगता। सब कहानी के साथ घुलते मिलते ही नज़र आते हैं।


मज़बूती

मज़बूती

फिल्म का मज़बूत पक्ष हैं माधवन और रीतिका सिंह। उनकी टाइमिगं बेजोड़ है। माधवन अपने बेस्ट पर रहते हैं और यहां भी वो अपने बेस्ट पर ही हैं। एक कमज़ोर कहानी को उन्होंने मज़बूती से पकड़े रखा है।


कमियां

कमियां

फिल्म की कमी है कि ये चक दे इंडिया की काफी याद दिलाती है पर कहीं भी उससे टक्कर नहीं ले पाती। वहीं दूसरी तरफ दर्शकों को सब कुछ इतना समझाया गया है कि फिल्म में कोई मूमेंट बचता ही नहीं। पूरी कहानी सबको पहले ही पता हो जाती है।


देखें या नहीं

देखें या नहीं

माधवन फैन्स के लिए ये फिल्म मस्ट वॉच है लेकिन कहानी के स्तर पर फिल्म में कुछ भी नया नहीं है। अगर कुछ अलग देखने जाना है तो साला खड़ूस कहीं से भी अलग फिल्म नहीं है।


English summary
Saala Khadoos movie review in hindi - R Madhavan shines in this Rajkumar Hirani's pruduced sports drama.
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