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#FilmReview: अज़हर, 1 करोड़...मैच फिक्स...बिका या टिका!

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Rating:
2.0/5


फिल्म - अज़हर
डायरेक्टर - टोनी डीसूज़ा
स्टारकास्ट - इमरान हाशमी, प्राची देसाई, नरगिस फखरी, लारा दत्ता

इमरान हाशमी स्टारर मोहम्मद अज़हरूद्दीन पर बनी फिल्म बायोपिक नहीं और इसी एलान के साथ ये फिल्म शुरू होती है। टोनी डीसूज़ा के निर्देशन में अज़हरूद्दीन की ज़िंदगी के उन पन्नों को उलटने की कोशिश की गई है जिन पर कुछ लिखा ही नहीं था।

कोई भी चीज़ अच्छी या बुरी नहीं हो सकती। इस दुनिया में सब कुछ सफेद या सब कुछ काला भी नहीं हो सकता। वैसे ही सही या गलत भी हर चीज़ नहीं हो सकती। सब कुछ होता है तो बीच में...जिसे अंग्रेज़ी में कई मर्तबा ग्रे कह दिया जाता है। और इसी 'बीच' की कहानी है अज़हर की ज़िंदगी।

मोहम्मद अज़हरूद्दीन, भारतीय क्रिकेट के इतिहास के सबसे सफल कप्तान। लेकिन सफलता जितनी जल्दी फलक पर पहुंचाती है उतनी ही तेज़ी से नीचे ज़मीन पर लाकर पटकती है और इस ऊठापटक की जीती जागती मिसाल थे मोहम्मद अज़हरूद्दीन।

1996 में एक मैच फिक्सिंग के इल्ज़ाम ने उनकी ज़िंदगी और करियर दोनों ही तबाह कर दिए। अज़हर ने देश को बेचा था? अज़हर ने अपने प्रोफेशन के साथ गद्दारी की थी? अज़हर ने सट्टेबाज़ों से पैसे लिए थे? अज़हर ने मैच फिक्स किया था?

इन सब सवालों की कलई एक एक कर ये फिल्म खोलती है जो कि एक बेहतरीन ड्रामा के सारे फ्लेवर देती है। जानिए फिल्म रिव्यू -

कहानी

मोहम्मद अज़हरूद्दीन भारतीय क्रिकेट का नया सितारा है। अपनी पत्नी नौरीन से बेहद प्यार करता है। फिर ज़िंदगी करवट लेती है और सब कुछ आता है - पैसा, शोहरत, कामयाबी, भारत की कप्तानी और संगीता....उसका नया प्यार! पर ज़िंदगी अगर करवट बदलती है तो कुछ अच्छे के साथ बहुत कुछ बुरा भी लाती है। यही बुरा अज़हर को तबाह कर देगा।

अभिनय

इमरान हाशमी ने अपने करियर का बेस्ट निकालकर अज़हर में रख दिया है। उनकी जितनी तारीफ की जाए वो कम है। पर उनका बेस्ट अज़हर के लिए कम है और वो क्रिकेटर कहीं से नहीं लग रहे हैं। नरगिस फखरी के पास बहुत अच्छा स्कोप था जिसको उन्होंने वेस्ट किया है और प्राची देसाई हमेशा की तरह एक रोई, सताई हुई बीवी के किरदार में हैं...टीवी से फिल्मों तक उनके एक्टिंग में कुछ नहीं बदला है।

निर्देशन

टोनी डीसूज़ा ने पूरी कोशिश की है कि अज़हर एक इंटरटेनमेंट पैकेज हो जाए। लेकिन बायोपिक में ज़्यादा इंटरटेनमेंट अक्सर मज़ा किरकिरा कर देता है और अज़हर कई जगह छूटती है। कई जगह टूटती है और इतना बिखर जाती है कि कहानी कहीं भी वापस बंध नहीं पाती। 

गीत संगीत

फिल्म का संगीत लचर है और कहीं से भी कहानी को नहीं बांधता। नरगिस फखरी का ओए ओए संगीता बिजलानी के त्रिदेव आईटम नंबर की कॉपी है पर यह गाना ध्यान खींचने लायक नहीं है।

तकनीकी पक्ष

एक स्पोर्ट्स फिल्म का सबसे बेहतर पार्ट होना चाहिए खेल के सीन और अज़हर में वो ही नहीं हैं। वीएफएक्स से लेकर ग्राफिक्स तक कुछ भी रियल नहीं लगता और यही फिल्म की सबसे इरिटेटिंग बात है।

लेखन और डायलॉग्स

रजत अरोड़ा की स्क्रिपटिंग ढीली है और कहीं भी फिल्म को बंधने नहीं देती। आप के पास कहानी के नाम पर पिटारा था - एक्सट्रा मैरिटल अफेयर, मिडिल क्लास आदमी, अचानक मिली शोहरत, क्रिकेट, पैसे का लालच...मतलब एक सुपरहिट कहानी के सारे एलिमेंट्स, कुछ नहीं था तो बस कहानी।

अच्छी बातें

इमरान हाशमी के साथ ही फिल्म की सबसे अच्छी बात है कि फिल्म परफेक्ट मेलोड्रामा है। वहीं कहीं कहीं डायलॉग्स बेहतरीन हैं। हालांकि सच्चाई से इनका कितना वास्ता है ये फिल्म साबित नहीं कर पाती। 

निगेटिव बातें

फिल्म क्रिकेट प्रेमियों को खींचने में नाकामयाब रहेगी क्योंकि अपनी बेस्ट कोशिश के बाद भी इमरान हाशमी की बॉडी लैंग्वेज से लेकर मिज़ाज़ तक कुछ भी क्रिकेटर से मेल नहीं खाता! वहीं फिल्म में कहानी के नाम पर एक ज़िंदगी के कुछ टूटे से किस्से हैं जिन्हें पूरा भी नहीं किया गया।

हमारी रेटिंग

हमारी तरफ से फिल्म को 2 स्टार। इमरान की बेहतरीन कोशिश के लिए। लेकिन फिल्म एक बेहतरीन बायोपिक हो सकती है जिसका मौका बालाजी टेलीफिल्म्स ने गंवा दिया है।

 

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