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#FilmReview: 1920 लंदन, इतना डर...डर से कभी नहीं लगा होगा!

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1.0/5

डायरेक्टर - टीनू सुरेश देसाई
कास्ट - शरमन जोशी, मीरा चोपड़ा, विशाल करवाल

कहते हैं कि शराब वक्त के साथ और अच्छी हो जाती है। लेकिन ऐसा हर चीज़ के साथ हो ये ज़रूरी तो नहीं है। कुछ चीज़ें वक्त के साथ खराब भी हो जाती हैं और 1920 लंदन वही चीज़ है।

रजनीश दुग्गल और अदा शर्मा के साथ जब विक्रम भट्ट ने 1920 बनाई तो फिल्म सरप्राइज़ हिट हो गई और उन्हें लगा कि एक फॉर्मूला हाथ लग गया। इतना डर आपको डरने में कभी नहीं लगा होगा जितना ये फिल्म देखकर होगा!

लेकिन ज़रा याद करिए बचपन में जब गणित के सवाल लगाते थे और अगर फॉर्मूला रट जााए तो सवाल झट से हल हो जाता है। ऐसा ही कुछ हुआ है 1920 लंदन के साथ। फिल्म का फॉर्मूला वही पुराना है - एक बुरी आत्मा, जिसे चाहिए एक अच्छी आत्मा। एक काबू में किया हुआ शरीर। एक तांत्रिक और कुछ मंत्र। 

विक्रम भट्ट की इस फिल्म में कुछ भी नया नहीं है सिवाय कास्ट के और उन्होंने भी अपने किरदारों के साथ कुछ नया करने की कोशिश भले ही की हो पर उसमें सफल तो कतई नहीं हुए हैं। जानिए फिल्म का रिव्यू -

कहानी

फिल्म की कहानी में कुछ भी नया नहीं है। 1920 के लंदन में एक राजस्थानी राजकुमारी है जिसके पति पर है एक चुड़ैल का साया। इसलिए वो अपने तांत्रिक एक्स बॉयफ्रेंड से मदद मांगती है, उस बुरे साए को हटाने के लिए।

ट्विस्ट

इस बार ट्विस्ट सिर्फ इतना है कि हर हॉरर फिल्म की तरह यहां भी हीरोइन पर भूत नहीं चढ़ा। इस बार थोड़े से बदलाव के लिए हीरो पर भूत चढ़ेगा और हीरोइन उसे बचाने के लिए लड़ेगी।

अभिनय

शरमन जोशी कुछ नया ट्राई करने के चक्कर में हर वो चीज़ ट्राई करना चाह रहे हैं जो उन्हें नहीं करनी चाहिए। वहीं मीरा चोपड़ा की पहचान वाकई बस इतनी है कि वो प्रियंका चोपड़ा की बहन हैं। टीवी से फिल्मों में आए विशाल करवाल के लिए ज़्यादा कुछ करने को नहीं था।

निर्देशन

फिल्म टीनू सुरेश देसाई का डेब्यू है और शायद इसीलिए फिल्म की कमियां आप हर दूसरे सीन में देखेंगे। हॉरर म्यूज़िक से लेकर प्रॉप्स तक फिल्म में सब कुछ नकली लगा है। वैसे देसाई रूस्तम भी डायरेक्ट कर रहे हैं।

तकनीकी पक्ष

फिल्म के ग्राफिक्स से आप भूत देख सकते हैं लेकिन उनसे डरने में भी आप को डर लगेगा, वो इतने नकली हैं। और ऐसा हर सीन के साथ है।

हॉरर एंगल!

फिल्म की कहानी में कहीं कोई हॉरर नहीं है। फिल्म में वही बेड उठाना, अकड़ जाना, आंखें पलट जाना जैसी चीज़ें हैं जिनसे अब आपको डर कतई नहीं लग सकता।

पुरानी फिल्मों से तुलना

जहां पहली फिल्म बहुत शानदार, और दूसरी ठीक ठाक थी वहीं इस तीसरे पार्ट ने किसी भी हॉरर फिल्म की धज्जियां उड़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है।

निगेटिव पॉइंट्स

फिल्म में ज़्यादा कुछ पॉज़िटिव नहीं है। वहीं कहानी से लेकर ग्राफिक्स तक फीके हैं। शरमन जोशी ने भी निराश ही किया है। ऐसे में फिल्म का म्यूज़िक किसी हॉरर फिल्म में सुसाइड की तरह नज़र आएगा।

देखें या नहीं

अगर शरमन जोशी फैन हैं तो फिल्म कतई मत देखिए। अगर हॉरर फैन हैं तो बिल्कुल नहीं। लेकिन अगर टाइम वेस्ट करने के फैन हैं तो ये फिल्म आपके लिए ही है।

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