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#Sarbjit - फिल्म नहीं असल कहानी..कैसे एक गलती ने पलटी पूरी जिंदगी!

Written by: Shweta
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रणदीप हुड्डा और ऐश्वर्या राय की फिल्म सरबजीत आज रिलिज हो गई। फिल्म सरबजीत सिंह पर बनी एक बायोपिक की कुछ लोग तारीफ कर रहे तो कुछ लोग बोल रहे फिल्म और अच्छा हो सकता था। बहरहाल फिल्म में कुछ बातों को ध्यान में रखना होता है।सरबजीत सिंह एक ऐसा इश्यू है जो 1990 से लेकर 2013 तक लगातार खबरों में रहा।

सरबजीत सिंह पर असल में भारत की राय कुछ और थी और पाकिस्तान की राय कुछ और। कहना गलत नहीं होगा कि सरबजीत सिंह की जिंदगी के पीछे कहीं ना कहीं भारत और पाकिस्तान के असमान्य रिश्ते जिम्मेदार हैं।अगर रिश्ते ऐसे नहीं होते तो सरबजीत सिंह की जिंदगी कुछ और होती।

[सिर्फ सरबजीत नहीं कई फिल्मों में ऐश का दिख चुका है ये अंदाज!]

सरबजीत सिंह की असल में जिंदगी बेहद दर्दनाक रही।उनको पूरो परिवार पर जो बीती वो बस वही समझ सकते हैं। फिल्म में तो ऐश ने सरबजीत की बहन दलबीर कौर का किरदान निभाया है लेकिन असल जिंदगी में दलबीर कौर ने अपने भाई को बचाने के लिए जिस हद तक कोशिश गृह मंत्रालय से लेकर विदेश मंत्रालय तक कर सकती थी उन्होंने की ।

आज फिल्म रीलिज हुई है और हम आपको विस्तृत रूप से बताते हैं कि सरबजीत सिंह की असली कहानी फिर शायद आप फिल्म देखने जाएं तो आप ज्यादा बेहतर तरीके से समझ सकें।देखिए आगे की स्लाइडस।

पंजाब का नौजवान

पंजाब का नौजवान

तरनतारन के एक गांव का रहने वाला एक बिल्कुल साधारण परिवार जो बाकी पंजाबियों की तरह खेती और नौकरी में विश्वास करता हो उस परिवार का एक 26 साल का लड़का जिसकी शादी होती है और दो बेटियों के साथ उनकी अच्छी जिंदगी चल रही होती है।

और एक गलती

और एक गलती

तरनातारन के भीखीविंद गांव से पाकिस्तान बॉर्डर ज्यादा दूर नहीं है। 90 के समय बॉर्डर पर फेंसिंग और तार नहीं लगे होते थे।सरबजीत सिंह नशे में गलती से भारत का बॉर्डर लांघकर पाकिस्तान पहुंच गए।

और फिर..

और फिर..

सरबजीत सिंह के गांव भीखीविंद से पाकिस्तान का बॉर्ड महज 13 किमी दूर है और उस समय कई बार भारत और पाकिस्तान के नागरिक भूले भटके सीमा पार कर जाते थे और कई बार उन्हें उसी समय छोड़ भी दिया जाता थाऔर आज भी भारत और बांग्लादेश के बॉर्डर पर ये आम बात है। लेकिन उस दिन ऐसा नहीं हुआ। सीमा पर तैनात एक कर्नल ने सरबजीत सिंह को रॉ एजेंट मानकर केस चलाया गया।

सबसे बड़ा सवाल

सबसे बड़ा सवाल

पाकिस्तान की न्यायपालिका भी भारत की तरह ही है लेकिन वहां आर्मी सियासी दखल दे सकती है। सरबजीत सिंह के मामले में कई फर्जीवाड़े भी किए गए जैसे उनके पासपोर्ट पर उनका नाम खुशी मोहम्मद था और तस्वीर उनकी ही थी और पाक उन्हें मंजीत सिंह कहता था जो असल में धमाकों का आरोपी था।

मंजीत सिंह कहानी

मंजीत सिंह कहानी

मंजीत सिंह असल में तो था जो धमाको का आरोपी था लेकिन सरबजीत सिंह को मंजीत सिंह बनाया गया। काफी समय तक पाक मीडिया भी उन्हें मंजीत सिंह कहती थी। न्यूज रिर्पोट्स की माने तो असल मंजीत सिंह उस समय भारत-पाकिस्तान नहीं बल्कि तीसरे देश में था।इधर 2005 में

2005 में वीडियो

2005 में वीडियो

2005 में एक वीडियो जारी किया गया जिसमें ये कहा गया कि सरबजीत सिंह ने अपना जुर्म कबूल कर लिया है लेकिन बाद में पता चला कि दबाब डालकर उनसे जुर्म कबुल करवाया गया।

2008 में फिर फांसी

2008 में फिर फांसी

2008 में आखिरकार फिर फांसी की तारीख तय की गई।भारत के तमाम कूटनीतिक प्रयास के बाद फांसी को रोका गया।

बहन ने एक किया जमीन आसमान

बहन ने एक किया जमीन आसमान

सरबजीत सिंह की बहन दलबीर कौर ने भाई वापस लाने के लिए जमीन आसमान एक कर दिया। वो भरोसा में नहीं एक्सन में विश्वास करती थी। आपको शायद पता नहीं हो लेकिन 1990 में जब नरसिम्हा राव ने उनसे फोन पर बात की तो वो तभी फोन रखी जब पीएम उनसे सीधे मिलने के लिए राजी हुए। 23 सालों में वो खुद पर्सनली 170 से भी ज्यादा भारत -पाक के नेताओं से मिलीं।

दलबीर कौर की मेहनत

दलबीर कौर की मेहनत

2008 में दलबीर कौर ने अपने दम पर इतने दमदार तरीके से सरकार तक बात पहुंचाई की 2008 में सरबजीत सिंह की फांसी रोकनी पड़ा।तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने खुद मामले में हस्तक्षेप किया। दलबीर कौर के बारे में संसद में भी कहा गया कि वो पंजाबी शेरनी हैं तो उनके जज्बे की तारीफ पाकिस्तान तक में की गई। फिल्म में ऐश्वर्या राय दलबीर कौर का ही किरदार निभा रही हैं।

जेल की प्रताड़ना

जेल की प्रताड़ना

अपने वकील को लिखे एक चिट्ठी में सरबजीत ने अपना दर्द लिखा कि उन्हें जेल में बुरी तरह प्रताड़ित किया जाता है।सभी उन्हें शक की निगाहों से देखते हैं और पाकिस्तान पुलिस भी उनके साथ जेल में बहुत ही अमानवीय सलूक करती है।

रिहाई की अफवाह

रिहाई की अफवाह

2012 में यह खबरें भी आई थी की सरबजीत सिंह को रिहा किया जाएगा लेकिन बाद में पता चला कि पाकिस्तान सरकार सरबजीत सिंह नहीं सुरजीत सिंह को रिहा कर रही है।

2013 में मृत्यू

2013 में मृत्यू

26 अप्रैल 2013 को सरबजीत सिंह पर जेल में कुछ कैदियों ने लोहे की रॉड,ईंट, सलाखों से हमला किया जिसके बाद उन्हें जेल ले जाया गया और उनकी मौत हो गई लेकिन एक सवाल रह गया..

मृत्यू पर सवाल

मृत्यू पर सवाल

सबसे बड़ा सवाल यह है कि सरबजीत सिंह की मौत हुई या यह एक साजिश थी क्योंकि जेल में कैदियों के पास ईंट, सलाखें और रॉड कहां से आए और तो और उन्हे कैदी इतनी देर तक पीटते रहे की उनकी मौत हो गई और तब जेल में पुलिस कहां थी।कई सवालों के साथ यह केस ऐसे हीं बंद हो गया और इसपर उमंग कुमार ने फिल्म बनाई सरबजीत जो आज से सिनेमाघरों में है।

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